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समस्तीपुर में राज्यपाल ने दी चेतावनी, एआई का गलत उपयोग समाज के लिए बन सकता है खतरा

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शाहपुर पटोरी पहुंचे राज्यपाल सैयद अता हसनैन, कहा- एआई का गलत उपयोग समाज के लिए खतरा

समस्तीपुर/आलम की खबर:समस्तीपुर जिले के शाहपुर पटोरी स्थित आचार्य नरेंद्र देव महाविद्यालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने शिक्षा व्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), अनुशासन और सामाजिक जागरूकता जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट कहा कि आने वाला समय तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है, ऐसे में बच्चों को इसके उपयोग से रोकना संभव नहीं है, लेकिन उन्हें इसका सही, संतुलित और जिम्मेदार इस्तेमाल सिखाना बेहद जरूरी है। उन्होंने शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि नई पीढ़ी को तकनीक के साथ सही दिशा नहीं दी गई, तो वही तकनीक समाज के लिए चुनौती भी बन सकती है।

राज्यपाल ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब वह दौर बीत चुका है जब केवल ब्लैकबोर्ड, किताब और कॉपी तक ही पढ़ाई सीमित रहती थी। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा को विद्यार्थियों के जीवन, सोच और व्यवहार से जोड़ना होगा। यदि शिक्षा केवल परीक्षा और अंक तक सीमित रह जाएगी, तो उसका वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि वे ऐसा माहौल बनाएं, जहां छात्र-छात्राएं पढ़ाई को बोझ नहीं बल्कि सीखने की एक आनंददायक प्रक्रिया के रूप में महसूस करें।

एआई को अवसर भी बताया, चुनौती भी

राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने कहा कि आने वाले वर्षों में बच्चे एआई टूल्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नई तकनीकों के बीच सीखेंगे और आगे बढ़ेंगे। ऐसे में शिक्षकों की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ज्ञान अर्जन, रिसर्च, इनोवेशन और जीवन को आसान बनाने का बड़ा माध्यम बन सकता है, लेकिन यदि इसका उपयोग गलत दिशा में हुआ तो इसके सामाजिक और नैतिक दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों को यह सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग शॉर्टकट के लिए नहीं, बल्कि सीखने, समझने और सृजन के लिए होना चाहिए। राज्यपाल ने संकेत दिया कि शिक्षा संस्थानों को अब सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें डिजिटल युग के अनुरूप विचारशील, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक तैयार करने की दिशा में काम करना होगा।

शिक्षा को सरल, सहज और रुचिकर बनाने की अपील

राज्यपाल ने शिक्षण पद्धति में बदलाव की आवश्यकता पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि आज के बच्चों पर पढ़ाई का दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में शिक्षकों का दायित्व सिर्फ विषय पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सकारात्मक सोच विकसित करना भी है। उन्होंने कहा कि यदि कक्षा का वातावरण अनुकूल और प्रेरक होगा, तो छात्र अपने आप सीखने की ओर आकर्षित होंगे।

उन्होंने कहा कि शिक्षा को जीवनोपयोगी, संवादपरक और व्यवहारिक बनाना समय की मांग है। बच्चों को रटने की बजाय समझने, सोचने और सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। राज्यपाल ने इस बात पर बल दिया कि किसी भी शिक्षण संस्थान की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब वहां से निकलने वाले विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संस्कारित नागरिक बनें।

अनुशासन को शिक्षा की रीढ़ बताया

अपने संबोधन में राज्यपाल ने अनुशासन को शिक्षा और जीवन दोनों की बुनियादी आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि अनुशासन के बिना किसी भी व्यक्ति, संस्था या समाज का संतुलित विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना अनुशासन, समयबद्धता, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण का बेहतरीन उदाहरण है और शिक्षा जगत इससे बहुत कुछ सीख सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि छात्र जीवन में अनुशासन की आदत विकसित हो जाए, तो आगे चलकर वही गुण उनके व्यक्तित्व, करियर और सामाजिक व्यवहार में झलकते हैं। राज्यपाल ने यह भी कहा कि शिक्षण संस्थानों को केवल अकादमिक उत्कृष्टता ही नहीं, बल्कि चरित्र और अनुशासन निर्माण का भी केंद्र बनना चाहिए।

टीबी मुक्त बिहार अभियान पर भी दिया जोर

राज्यपाल ने अपने भाषण में स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता को भी शिक्षा से जोड़ते हुए कहा कि समाज के पढ़े-लिखे वर्ग की जिम्मेदारी केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से टीबी मुक्त बिहार अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक समाज के हर वर्ग तक जागरूकता नहीं पहुंचेगी, तब तक ऐसे अभियानों को पूर्ण सफलता नहीं मिल पाएगी।

उन्होंने शिक्षकों, विद्यार्थियों और बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की कि वे स्वास्थ्य, स्वच्छता और जनजागरूकता से जुड़े अभियानों में आगे बढ़कर भाग लें। उनका कहना था कि एक शिक्षित समाज वही है, जो केवल ज्ञान अर्जित न करे, बल्कि अपने आसपास के लोगों के जीवन को भी बेहतर बनाने में योगदान दे।

रामनाथ ठाकुर ने कर्पूरी ठाकुर की विरासत को किया याद

कार्यक्रम में मौजूद केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शाहपुर पटोरी और आसपास का इलाका जननायक कर्पूरी ठाकुर की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने शिक्षा, सामाजिक न्याय और जनहित की राजनीति को नई दिशा दी।

उन्होंने कहा कि शिक्षा के प्रसार और समाज के कमजोर तबकों को आगे लाने में कर्पूरी ठाकुर का योगदान आज भी प्रेरणा देता है। रामनाथ ठाकुर ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज को बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम है और इस क्षेत्र की पहचान भी शिक्षा व सामाजिक चेतना से जुड़ी रही है।

इतिहास लेखन में नए दृष्टिकोण की बात

सेमिनार में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इतिहास लेखन की परंपरा अब नए दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रही है। केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता के केंद्रों तक इतिहास को सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। अब जरूरत है कि संतों, किसानों, लोकनायकों और समाज के वास्तविक निर्माताओं की गाथाओं को भी इतिहास में उचित स्थान मिले।

उन्होंने कहा कि जब नई पीढ़ी अपने समाज के वास्तविक नायकों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जानेगी, तभी उसमें बेहतर संस्कार और राष्ट्रीय चेतना विकसित होगी। उनके इस वक्तव्य को उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों ने गंभीरता से सुना।

शिक्षक-छात्र संवाद को मजबूत करने पर बल

कार्यक्रम में जेपी यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने शिक्षा के केंद्र में शिक्षक की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज में शिक्षा तभी फलती-फूलती है, जब वहां शिक्षक का सम्मान हो और शिक्षक-छात्र के बीच संवाद मजबूत हो। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल विषय-ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों, नैतिकता और चरित्र निर्माण की भी समान भागीदारी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे नई पीढ़ी को केवल प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करें। यदि शिक्षा में संवाद, संवेदना और संस्कार का समावेश होगा, तो उसका असर समाज पर भी सकारात्मक रूप से दिखाई देगा।

समाज निर्माण में शिक्षक को बताया आधारशिला

कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि शिक्षक केवल कक्षा तक सीमित व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज निर्माण की आधारशिला हैं। उनके व्यक्तित्व, दृष्टि और कार्यशैली का असर आने वाली कई पीढ़ियों पर पड़ता है। इसलिए शिक्षकों की भूमिका को मजबूत करना, उनका सम्मान बढ़ाना और शिक्षा व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाना समय की बड़ी आवश्यकता है।

वक्ताओं ने कहा कि यदि देश को समृद्ध, संस्कारित और वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाना है, तो इसकी शुरुआत विद्यालयों और महाविद्यालयों से ही होगी। शिक्षा और शिक्षक को केंद्र में रखे बिना भारत को ज्ञान, संस्कृति और नेतृत्व के क्षेत्र में आगे ले जाना संभव नहीं है।

गणमान्य लोगों की रही मौजूदगी

इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. डॉ. अजय कुमार ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि मंच संचालन डॉ. अशरफ इमाम ने किया। समारोह में शिक्षा, समाज, इतिहास और प्रशासन से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का माहौल शैक्षणिक, चिंतनशील और प्रेरणादायक रहा, जहां शिक्षा के वर्तमान और भविष्य को लेकर गंभीर विमर्श देखने को मिला।

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